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कांग्रेस के दिग्गज नेता गुलाम नबी आजाद ने पार्टी के सभी पदों से इस्तीफा दे दिया है। इसके ठीक पहले कांग्रेस के एक अन्य नेता आनंद शर्मा ने भी सभी पदों से इस्तीफा दे दिया था।

 

आनंद शर्मा अभी भी पार्टी में बने हुए हैं। कांग्रेसी नेताओं के इन इस्तीफों से केवल कांग्रेस का ही नुकसान होने की आशंका नहीं जताई जा रही है, बल्कि इन नेताओं के इस्तीफे से भाजपा को भी बड़ा नुकसान उठाना पड़ सकता है। कांग्रेस के कमजोर होने से भाजपा की गुजरात में मुश्किलें बढ़ सकती हैं, तो हिमाचल प्रदेश में आम आदमी पार्टी को पैर पसारने का अवसर मिल सकता है।

प्रधानमंत्री नरेंद्र मोदी शनिवार-रविवार को गुजरात के दो दिवसीय दौरे पर रहेंगे। इस दौरान वे कई महत्त्वपूर्ण योजनाओं का शिलान्यास और लोकार्पण करेंगे। यह गुजरात चुनाव से पूर्व पार्टी को मजबूत करने की कोशिश मानी जा सकती है। लेकिन भाजपा की पूरी कोशिशों के बीच कांग्रेस नेता के इस्तीफे से पार्टी के लिए मुश्किलें बढ़ सकती हैं। गुलाम नबी आजाद ने पार्टी से इस्तीफा देते समय पार्टी की बुरी हालत के लिए राहुल गांधी को जिम्मेदार ठहराया है। उन्होंने कहा है कि राहुल गांधी के 2013 में पार्टी का उपाध्यक्ष बनने के बाद से अब तक 39 विधानसभा चुनावों में हार मिल चुकी है।

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सात सितंबर से शुरू होगी भारत जोड़ो यात्रा

गुलाम नबी आजाद का यह हमला राहुल गांधी की छवि को और ज्यादा नुकसान पहुंचाने वाला है। उन्होंने यह हमला तब किया है जब पार्टी सात सितंबर से देश के 12 राज्यों से 3500 किलोमीटर लंबी भारत जोड़ो यात्रा निकालकर पार्टी को मजबूत करने की कोशिश की जा रही है। इसके जरिए राहुल गांधी की छवि को भी मजबूत किये जाने की योजना थी और यात्रा की शुरुआत वे ही करने वाले थे। लेकिन इसी बीच इस इस्तीफे से राहुल गांधी को लेकर नई चर्चाएं शुरू हो गई हैं।

राहुल गांधी ने 2017 के गुजरात विधानसभा चुनाव में जमकर प्रचार किया था और एक समय यहां तक माना जा रहा था कि कांग्रेस चुनाव जीत सकती है। हालांकि, अंतिम समय में पीएम मोदी ने गुजरात में तीन दिनों का कैंप करके पूरा चुनावी गणित बदल दिया और वे भाजपा को अपने गृहराज्य में दोबारा जिताने में कामयाब हो गए।

लेकिन आनंद शर्मा और गुलाम नबी आजाद जैसे सीनियर नेताओं के पार्टी-पद छोड़ने से जनता के बीच कांग्रेस पार्टी और राहुल गांधी को लेकर एक नकारात्मक छवि बनती जा रही है। इससे पार्टी के कार्यकर्ताओं का मनोबल भी टूट रहा है। इन परिस्थितियों के बीच जब राहुल गांधी गुजरात और हिमाचल प्रदेश में चुनाव प्रचार करने जाएंगे, तब बहुत संभव है कि इसका उतना अच्छा असर न पड़े जितना कि पार्टी उम्मीद कर रही है।

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लेकिन, आम आदमी पार्टी तेजी से कांग्रेस की खोती जमीन को हथियाने की रणनीति अपना रही है औऱ वह गुजरात में सघन प्रचार कर रही है। सूरत नगर निगम की 118 सीटों में से 27 पर जीत हासिल करके पार्टी ने गुजरात में अपनी संभावनाओं को एक नई ऊंचाई दे दिया है। यही कारण है कि पार्टी गुजरात में अपने सबसे तेज रणनीतिकारों को मैदान में उतारकर चुनाव लड़ने की कोशिश कर रही है। वह लगातार आदिवासी-किसान और पटेल समुदाय के लोगों को जोड़कर अपने को आगे बढ़ाने का काम कर रही है।

क्यों जीत जाती थी भाजपा

गुजरात के वरिष्ठ पत्रकार युजवेंद्र दुबे ने अमर उजाला को बताया कि गुजरात का यह वोट बैंक भाजपा और कांग्रेस के बीच बंट जाता था। कांग्रेस की मुस्लिम हितैषी छवि होने के कारण उसे एक वर्ग का वोट नहीं मिलता था, जबकि भाजपा इस मामले में ज्यादा लोगों को अपने साथ जोड़ लेती थी, जिससे उसकी जीत सुनिश्चित हो जाती थी। नरेंद्र मोदी की गुजरात अस्मिता से जुड़ी छवि भाजपा की जीत को तय करने में महत्त्वपूर्ण भूमिका निभाती थी।

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लेकिन आम आदमी पार्टी पर मुस्लिम हितैषी होने का टैग चस्पा नहीं हो पाया है। अपनी हिंदू छवि को बचाए रखने के लिए अरविंद केजरीवाल लगातार प्रयास करते रहते हैं और उन्हें इसका लाभ भी मिल रहा है। यही कारण है कि गुजरात में भाजपा की चुनावी तैयारियों के केंद्र में कांग्रेस की जगह आम आदमी पार्टी ने ले लिया है। उसकी मुफ्त की योजनाएं गरीब और प्रवासी उत्तर भारतीय मतदाताओं के बीच विशेष लोकप्रियता पा रही हैं। इस बीच कांग्रेस के कमजोर होने से यह पूरा वोट बैंक पूरी तरह आम आदमी पार्टी की तरफ शिफ्ट कर सकता है और भाजपा की मुश्किलें बढ़ सकती हैं।

हालांकि, एक संभावना यह भी है कि यदि आम आदमी पार्टी को अपेक्षित सफलता न मिले और वह केवल कांग्रेस का वोट बैंक काटने का ही काम कर पाती है, तो भाजपा की सीटें बढ़ जाएं, लेकिन इसके बाद भी भाजपा लंबे भविष्य को देखते हुए केजरीवाल को ज्यादा आगे बढ़ता नहीं देखना चाहेगी और कांग्रेस के कमजोर होने पर भाजपा के लिए यही मुश्किल उसके देहरी पर आ सकती है जिससे बचने की वह पुरजोर कोशिश कर रही है।