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राजनीतिक दल चुनावों में जिस तरह से मतदाताओं को लुभाने के लिए रेवड़ियां यानी “फ्री सुविधाएं उपहार” बांटते हैं बदलते वक्त के साथ इसका चलन जिस तेजी बढ़ रहा है, उसे देखते हुए चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में अहम जवाब दिया है।

 

फ्री उपहार के चलन के खिलाफ दाखिल एक याचिका के जवाब में चुनाव आयोग ने सुप्रीम कोर्ट में हलफनामा दाखिल कर कहा है कि “चुनावी दलों द्वारा फ्री सुविधाएं उपहार दिए जाने से देश की अर्थव्यवस्था पर कैसा असर होगा, इसका विचार स्वयं मतदाताओं को करना होगा”। चुनाव आयोग द्वारा इस तरह की कार्रवाई करना शक्तियों के इस्तेमाल का अतिरेक होगा।

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चुनाव आयोग ने कहा कि वर्तमान में उसके पास कुछ आधारों को छोड़कर किसी राजनीतिक दल का पंजीकरण रद्द करने की शक्ति नहीं है। जैसे कि भारतीय राष्ट्रीय कांग्रेस बनाम समाज कल्याण संस्थान अन्य (2002) के मामले में शीर्ष अदालत द्वारा परिभाषित किया गया है कि धोखाधड़ी जालसाजी से प्राप्त पंजीकरण, पार्टी द्वारा संविधान के विश्वास निष्ठा को समाप्त करने आदि के आधार पर पंजीकरण रद्द किया जा सकता है।

 

चुनाव आयोग का यह जवाब हलफनामे के माध्यम से सुप्रीम कोर्ट में दाखिल हुआ। भाजपा नेता वकील अश्विनी कुमार उपाध्याय द्वारा दायर एक जनहित याचिका पर बीती 25 जनवरी को सुप्रीम कोर्ट ने केंद्र चुनाव आयोग को नोटिस जारी किया था। याचिका के अनुसार, चुनाव से पहले राजनीतिक दलों द्वारा पब्लिक फंड से तर्कहीन तरीके से मुफ्त उपहार का वादा या उपहार बांटना मतदाताओं को गलत तरीके से प्रभावित करता है, जिससे स्वतंत्र व निष्पक्ष चुनाव की जड़ें हिलती है चुनाव की गरिमा खत्म होती है। इस याचिका के साथ चुनाव आयोग को ऐसा करने वाली पार्टियों के चुनाव चिन्ह जब्त करने उनका रजिस्ट्रेशन रद्द करने की मांग की गई थी।

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चुनाव आयोग ने कहा है कि वह राज्य की नीतियों निर्णयों को विनियमित नहीं कर सकता। यह तभी संभव है, जब चुनाव जीतने वाली पार्टी सरकार बनाने पर प्रावधानों के जरिए इसे सक्षम बनाए। इसके बिना चुनाव आयोग द्वारा इस तरह की कार्रवाई करना शक्तियों के इस्तेमाल का दुरुपयोग होगा। हालांकि, हलफनामे में ये भी कहा कि चुनाव आयोग ने दिसंबर, 2016 में केंद्र सरकार को चुनावी सुधारों के लिए 47 प्रस्ताव भेजे थे, उनमें ही उपयुक्त आधार पर राजनीतिक दलों का रजिस्ट्रेशन रद्द करने की शक्ति शामिल थी।

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