English മലയാളം

Blog

Screenshot 2022-11-10 140320

अगर दलित समुदाय का कोई व्यक्ति इस्लाम या ईसाई धर्म अपनाता है, तो क्या उसे अनुसूचित जाति का दर्जा दिया जा सकता है ? सुप्रीम कोर्ट में ऐसी ही एक याचिका लगाई गई है। इस पर केंद्र सरकार ने जवाब दाखिल किया है।सरकार ने साफ तौर पर इसका विरोध किया है। सरकार का कहना है कि ईसाई और इस्लाम धर्म में जाति व्यवस्था का कॉन्सेप्ट नहीं है, लिहाजा उन्हें अनुसूचित जाति का व्यक्ति नहीं मानना चाहिए।

 

Also read:  दिल्ली में कोरोना के अब तक के सबसे ज्यादा 7,745 नए मामले आए सामने

केंद्र ने दलित ईसाइयों और दलित मुसलमानों को अनुसूचित जातियों की सूची से बाहर किए जाने का बचाव करते हुए कहा है कि ऐतिहासिक आंकड़ों से पता चलता है कि उन्होंने कभी किसी पिछड़ेपन या उत्पीड़न का सामना नहीं किया। दलित ईसाई और दलित मुसलमानों के अनुसूचित जातियों के लाभों का दावा नहीं कर सकने का तर्क देते हुए सामाजिक न्याय और अधिकारिता मंत्रालय ने उच्चतम न्यायालय में दाखिल एक हलफनामे में कहा कि 1950 का संविधान (अनुसूचित जाति) आदेश किसी भी असंवैधानिकता से ग्रस्त नहीं है।

Also read:  क्वाड में वर्चुअल बैठक में आज पीएम मोदी समेत बाइडन-मॉरिसन-किशिदा शामिल होंगे

हलफनामा गैरसरकारी संगठन (एनजीओ) ‘सेंटर फॉर पब्लिक इंटरेस्ट लिटिगेशन’ (सीपीआईएल) की एक याचिका के जवाब में दायर किया गया था, जिसमें दलित समुदायों के उन लोगों को आरक्षण और अन्य लाभ देने की मांग की गई थी जिन्होंने इस्लाम और ईसाई धर्म अपना लिया था।

केंद्र सरकार ने अपने शपथ पत्र में रंगनाथ मिश्रा कमीशन की रिपोर्ट का भी जिक्र किया है। इस रिपोर्ट में कहा गया है कि धर्मांतरण करने वालों को भी अनुसूचित जाति का दर्जा मिलते रहना चाहिए। केंद्र सरकार ने इस अनुशंसा को सही नहीं माना है। इस मुद्दे पर भारत के पूर्व मुख्य न्यायाधीश केजी बालाकृष्णन की अध्यक्षता में तीन सदस्यीय आयोग का एक गठन किया गया है। आयोग इस विषय पर अभी विचार कर रहा है।

Also read:  संयुक्त अरब अमीरात में गर्मियों का अंत: 24 अगस्त को सुहैल स्टार देखे जाने के बाद क्या होगा?